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Pyar ka Nasha- Kabhi Bhi-Kahi Bhi

हेल्लो दोस्तों, मेरा नाम है उर्वशी, लेकिन मेरे चाहने वाले मुझे राशिका के नाम से भी बुलाते है| आज मैं आपको अपनी जिन्दगी की एक ऐसी सच्ची कहानी के बारे में बताने वाली हूँ जिससे आप अभी तक अनजान थे| लेकिन आज में आपको इस सब के बारे में बताना काफी जरुरी समझती हूँ| क्योकि आपको तो पता ही है, मैरे सीने की तरफ कितना बोझ है और इसे हल्का करना भी तो जरुरी है|

इस कहानी में दो किरदार है पहला आयुष और दूसरी यानी की मैं राशिका|

इस बात को ज्यादा समय नहीं हुआ है, यहीं कुछ 3 साल पहले की ही बात है जब हमारा परिवार मुंबई में रह रहा था| उस समय मेरी उम्र कुछ ज्यादा नहीं, यहीं कुछ 19 वर्ष की थी| मैं 19 वर्ष की गौरे रंग और भूरे बालों वाली एक जवान लड़की थी| मेरी आँखों का रंग भी भूरा था जो की मेरे सौंदर्य में चार चाँद लगाता था| अपने खुबसूरत पतले और आकर्षक शरीर के चलते मुझे मोडलिंग और मेकअप करने का शौक भी काफी अधिक चढ़ गया था|

मेरे पापा का यहाँ काफी बड़ा बिजनेस था| हमारे यहाँ किसी भी चीज़ की कोई कमी नहीं थी और यहाँ तक की मेरे सोचने भर से ही हर चीज़ मेरे सामने रख दि जाती थी| मुझे मेरे परिवार से कोई ज्यादा रोक-टोक नहीं है, मैं कहीं भी घूम-फिर सकती हूँ यहां तक की मेरे कुछ दोस्त लड़के भी है| स्कूल के तो हर एक लड़के मेरी खूबसूरती पर मरते है, लेकिन मुझे अपने दिल की बात बताने से थोडा डरते है| और कुछ तो मेरे पापा के डर से मुझे अपने दिल की बात कहने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते है|

अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब मुझे किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना था, लेकिन मुझे कुछ भी ठीक से समझ नहीं आ रहा था| मैंने अपनी छुट्टियों में कंप्यूटर कोर्स किये थे, इसलिये मेरी कंप्यूटर के क्षेत्र में काफी ज्यादा रूचि थी| और इसीलिए मैंने कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई के लिए एक बड़े कॉलेज में एडमिशन ले लिया था|

मैंने कॉलेज जाना भी शुरू कर दिया था लेकिन यहाँ के माहौल में ढल पाना मेरे लिए काफी ज्यादा मुश्किल था| यहाँ के लड़के मुझे काफी ज्यादा घुर रहे थे, और मेरी खूबसूरती को निहार रहे थे| मैं देख पा रही थी कि कुछ लड़के मेरी खूबसूरती की चर्चा कर रहे है| जब मैंने कॉलेज में अपनी पहली क्लास अटेंड की थी तभी मुझे समझ आ गया था कि कम्प्यूटर सब्जेक्ट मेरे बस का नहीं है और नाही इस कॉलेज में ढल पाना मेरे बस में है|

तभी हमारा लंच ब्रेक होता है और मेरी नजर क्लास से बाहर निकलते हुए एक लड़के पर पड़ती है| मुझे वो लड़का काफी देखा-देखा सा लग रहा था, और मैंने उसे पहचानने में बिलकुल भी समय नहीं लगाया| वह मेरे मुंबई वाले स्कूल का ही पढने वाला लड़का था, जिसने मेरे साथ ही स्कुल पासआउट किया था| मैं उसकी तरफ देखते हुए “हाय” कहा, और तुरंत उसी वक्त उसने भी मेरी तरफ देखा| वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे उसे जरा भी अंदाजा नहीं है कि मैं उसी की क्लास में पढ़ती हूँ| मेरी जवान खूबसूरती और हॉट फिगर देखकर तो वह हक्का-बक्का ही रह गया था| ऐसा मानों की उसकी आँखे फटी की फटी ही रह गयी हो| वो जैसे ही मेरे नजदीक बड़ा मैंने उससे कहा…..

“शायद तुमने मुझे ठीक से पहचाना नहीं? हम स्कूल में एक ही क्लास में थे”

“हां रशिका मैंने तुम्हे पहचान लिया है, मेरा नाम आयुष है” – उसने जवाब दिया

“ओह गुड तुम तो मेरा नाम भी जानते हो” और बताओं तुमने इतना दूर, इतने बड़े कॉलेज में एडमिशन क्यों लिया”

“उसने हँसते हुए जवाब दिया – रशिका मैंने बाहरवी काफी अच्छे नम्बर से पास की थी, इसलिये मुझे इतने बड़े कॉलेज में पढने के लिए स्कालरशिप मिली और इसलिये में यहाँ हूँ”

तभी मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया – चलो ये भी अच्छा ही हुआ, तुम्हे भी इतने अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल गया और मुझे भी कॉलेज में अब एक साथी मिल गया है जो की मुझे काफी अच्छे से जानता है”

और इतना कहकर में वहां से चली गयी| इस मुलाक़ात के बाद मुझे नहीं पता की उसके दिमाग में क्या चल रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी और वो ये थी कि मुझे अब एक जरिया मिल चूका था, इस चार साल के कॉलेज को अच्छे नम्बरों से पास करने का| मैंने उससे बातों ही बातों में ये तक पता लगा लिया था कि वह कॉलेज के ही नजदीक में एक होस्टल में रह रहा था| मुझे मेरे पिताजी ने कॉलेज से ही कुछ दुरी पर एक फ्लेट किराए पर दिलवा दिया था, और मेरे पास नौकर-चाकर और वो सभी सुविधाए मौजूद थी जो की मुझे पढ़ाई करने में मदद करती थी| लेकिन आयुष के साथ ऐसा कुछ भी नहीं था, उसे अपने घर से कोई भी सुविधा नहीं दि गयी थी, और देते भी कैसे? उसके घर वालों की आर्थिक स्थिति इतनी भी कुछ ख़ास नहीं थी| और तो और उसके पास अपना कोई पर्सनल कंप्यूटर तक नहीं था, और इसी वजह से उसे काम करने के लिए अपना काफी समय कॉलेज में ही बिताना पड़ता था|

एक साथ मिलते-जुलते और बातें करते हुए अब आयुष और मैं एक अच्छे दोस्त बन चुके थे| और आयुष भी रोजाना मेरे फ्लेट में मुझसे मिलने और बातें करने आया करता था साथ ही मुझे इसी बहाने थोडा बहुत पढ़ा भी दिया करता था| एक तरफ जहाँ मैं अब ठीक से पढ़ाई कर पा रही थी, वहीँ दुसरी तरफ आयुष के लिए भी ये सोने पे सुहागा होने के जैसा था| दरअसल अब उसे कंप्यूटर के लिए कॉलेज में समय नहीं देना पड़ता था, साथ ही एक हॉट पार्टनर पास में होने की वजह से उसका मन भी काफी लगा रहता था|

आयुष कम बोलने वाल और थोड़े सीधे स्वभाव वाला लड़का था| लेकिन दिमाग और शरीर से वो काफी जवान था और उसे हर चीज़ की अब अच्छे से समझ थी, उसकी खूबसूरती के साथ-साथ मुझे उसकी ये खासियत भी काफी अच्छी लगती थी| कॉलेज के बाद का काफी समय अब हम एक दुसरे के साथ ही गुजारा करते थे| ऐसा लगता था मानों हमें एक दुसरे की आदत सी हो गयी है| वो कॉलेज के बाद अक्सर सीधा मेरे फ्लेट में आ जाया करता था| सच कहूँ तो में अब उसे पसंद करने लगी थी|

अब हमें एक दुसरे के साथ काफी महीने बीत चुके थे| अब पढ़ाई करते हुए मैं काफी बार आयुष को मेरे बदन को घूरता हूँआ महसुस कर चुकी थी| वो मेरे टाइड कपड़ों में मेरे गुप्त अंगों को के उभार को देखा करता था| एक अमीर फैमिली की वजह से मुझे आधे नग्न वस्त्र या स्कर्ट में होना एक आम बात थी, लेकिन आयुष के लिए ये बिलकुल भी आम नहीं था| मेरे ढीले वस्त्रों में वो अक्सर में स्तन के बीच की ढलानों और मेरी नंगी टांगों को देखकर काफी ज्यादा उत्तेजित हो जाया करता था| वो चाहे जितना भी छुपाने की कोशिश करें, मैं उसकी पेंट में उस उभार को महसुस कर सकती थी| और जब कोई खुबसूरत लड़का किसी लड़की को देखता है तो लड़की के भी हाल-चाल में काफी बदलाव आ जाता है| दरअसल हमें भी लड़कों को ऐसे तडपाने में काफी मजा आता है|

एक साथ काफी समय बीत जाने के बाद एक दिन मैंने आयुष को काफी ज्यादा निराश होता पाया, वो अपनी किसी परेशानी के कारण सोच में डूबा हुआ था| मैंने बहुत जानने की कोशिश की और यहाँ तक उससे पूछा भी, लेकिन वह कुछ भी बताने को तैयार ही नहीं था| तभी मैंने उसके किसी दोस्त के पास जाकर पुरे मामले को जानने की कोशिश की तो उसके दोस्त ने मुझे बताया की आयुष अपनी आर्थिक स्थिति के कारण काफी ज्यादा परेशान है| उसके पास जो पैसे थे, वे अब खतम होने लगे थे जिस वजह से वह होस्टल और खाने पीने का खर्चा बिलकुल नहीं उठा सकता था|

मैंने बिना किसी देरी के तुरंत ही अपने पापा को फ़ोन लगाया और आयुष की इस स्थिति के बारे में उनसे बात की|

मैंने पापा से कहा – पापा मैंने आपको आयुष के बारे में बताया था ना?

कौन आयुष – मेरे पिता ने जवाब देते हुए कहा

तभी मैंने कहा – पापा वहीँ आयुष जो मुझे पढ़ा रहा था

क्या हुआ बेटा उसने कुछ किया क्या? – पापा ने मुझसे पूछा

अरे नहीं पापा आयुष बहुत अच्छा लड़का है, लेकिन अभी वो किसी परेशानी में उलझा हुआ है उसने मेंरी बहुत मदद की है और दोस्त होने के कारण में भी उसकी मदद करना चहती हूँ

बातों ही बातों में मैंने पापा से कहकर मेरे ही फ्लेट वाली बिल्डिंग में एक फ्लेट दिलवा दिया| लेकिन आयुष ने फ्लेट लेने से मना कर दिया| आयुष एक स्वाभिमानी लड़का था उसे किसी का जरा भी एहसान लेना पसंद नहीं था| लेकिन काफी जिद करने के बाद मैंने उसे मना लिया| मैंने उससे कहा की जब तुम्हारे पास पैसे हो तुम मुझे लौटा देना मैं तुम पर बिलकुल भी एहसान नहीं कर रही हूँ|

अब आयुष और में एक ही बिल्डिंग में रहा करते थे, वो अब नहाने के बाद सीधा मेरे घर आ जाया करता था| आयुष भी अब काफी खुश था क्योकि अब उसे होस्टल, खाने पीने और बाकी चीज़ों का खर्च नहीं देना पड़ता था| अब हम दौनों साथ मिलकर ही खाना भी बना लिया करते थे| वह पूरा दिन मरे साथ मेरे फ्लेट पर ही रहा करता था, बस सोने के लिए अपने फ्लेट पर चला जाया करता था|

धीरे-धीरे अब हम एक-दुसरे के और भी ज्यादा करीब आने लगे थे| कभी-कभी तो हम साथ में फिल्म देखने भी चले जाया करते थे| धीरे-धीरे अब में आयुष से बहुत ज्यादा प्यार करने लगी थी, और साथ ही वो भी मुझे अब बहुत ज्यादा अहमियत देने लगा था| वो अब अचानक से मेरी काफी ज्यादा फ़िक्र करने लगा था और यहीं नहीं वो अब मेरी हर छोटी-बड़ी चीज़ों का ध्यान तक रखने लगा था| एक बार जब थिएटर में काफी ज्यादा लेट पहुंचे तो अंधरे में मुझे कुछ भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था| तभी आयुष ने बिना मेरी इजाजत के मेरी कमर में हाथ रखकर मुझे सीट की तरफ ले जाकर बैठा दिया| मुझे अब उसमे काफी अपना-पन सा लगने लगा था| और इसलिये मुझे उसकी ये सभी आदतें बहुत साधारण सी लगने लगी थी| अक्सर थिएटर में वो मेरे कंधे पर हाथ रख कर बैठ जाया करता था| और अपने हाथों से मेरे कंधो को सहलाने लगता था| कभी-कभी तो वह मेरी कमर को भी सहलाने लगता था| अब शायद आयुष भी मुझे अपना समझने लगा था|

हम रोजाना सुबह एक सुंदर से बगीचे में दौड़ लगाने जाया करते थे, सुबह की ठन्डे मौसम में मेरे स्तन गोल, कड़क और काफी उभरे हुए नजर आते थे| और शायद इसीलिए आयुष ने भी दौड़ लगाने के लिए सूबह का समय चुना था| क्योकि वो नहीं चाहता था, मेरी इस भड़कती हुई जवानी को उसके अलावा और कोई देखे| साथ ही आयुष के लम्बे-चौड़े शरीर से पसीना टपकता देख मुझे भी काफी अच्छा महसूस होता था|

और इसी के साथ कॉलेज का पहला साल खतम होने वाला था| पहला साल समाप्त हो जाने के बाद हम दौनो छुट्टी बिताने के लिए मुंबई निकलने वाले थे| पापा ने मेरे वापस लौटने के लिए कुछ व्यवस्था करवाई हुई थी, लेकिन मैंने उनसे कहा की आप रहने दीजिये मैं आ जाउंगी आप चिंता मत करो| और पापा को बिना कुछ बताए में आयुष के साथ ट्रेन में ही मुंबई आ गयी| और हम अपने अपने घर की तरफ चल दिए|

शुरुआत में कुछ दिन तो घर वालों, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मिलने-जुलने में ही निकल गए| इतने दिन बीत जाने के बाद अब मुझे आयुष की बहुत याद आ रही थी| मैंने बिना किसी देरी के आयुष को कॉल लगा दिया| उसने  तुरंत ही मेरा कॉल उठा लिया, जैसे वो मेरे ही फ़ोन का इन्तजार कर रहा हो| अब हम दौनों ने बाते करना शुरू किया|

उसने कहा – और राशिका बताओं तुम कैसी हो

मैं बिलकुल ठीक हूँ तुम्हारा हाल बताओं – मैंने जवाब दिया

तभी आयुष ने कहा – मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा है| ऐसा लग रहा है सब कुछ होने के बाद भी कुछ अधूरा सा है| शायद मुझे तुम्हारी आदत हो गयी है|

अब में समझ गयी थी कि आयुष भी मुझसे बहुत ज्यादा प्यार करने लगा है| छुट्टियों के दिन हम एक दुसरे से काफी ज्यादा मिले-जुले और हम एक साथ कई घुमने भी गए| अब हम एक दुसरे के बिना कही भी नहीं रह सकते थे|

काफी दिन बीत चुके थे, और हमारे कॉलेज लौटने का समय भी आ गया था| मैंने पहले की तरह पापा को बोलकर अकेले कॉलेज जाने का फैसला किया और फिर आयुष के साथ ट्रेन में बैठकर फिर से हम कॉलेज की तरफ निकल गए|

एक दिन मुझे कॉलेज में टीचर ने प्रोजेक्ट बनाने को कहा, और इसलिये मैंने आयुष को उस दिन मेरी मदद करने के लिए अपने ही रूम में रोक लिया| हम रात को 12 बजे तक बैठकर साथ में प्रोजेक्ट बना रहे थे कि मुझे तेज नींद आने लगी| और अचानक बारिश की वजह से लाईट भी चली गयी तो दौनो ने रात भर साथ ही रुकने का फैसला लिया| आयुष मुझे कुछ भी काम नहीं करने देता था, उसने तुरंत टोर्च जलाकर एक रूम में बिस्तर बिछाकर मेरे लिए सोने की व्यवस्था की और खुद दुसरे रूम में अपने लिए बिस्तर बिछाने के लिए चल दिया| बाथरूम का रास्ता मेरे रूम की और से होकर गुजरता था इसलिये मैंने अपने रूम का दरवाजा खुला रखना ही जरुरी समझा| अब हम दौनो अलग-अलग रूम में जाकर सो चुके थे, तभी एकदम जोर की बिजली कड़कती है| मुझे बिजली से बहुत डर लगता है और इसलिये मैंने आयुष को नींद से उठाकर कहा – “आयुष क्या तुम मेरे नजदीक आकर सो सकते हो? मुझे बहुत डर लग रहा है|

इतने में आयुष मेरे करीब आकर सो गया, लेकिन मुझसे थोडा दूर हटकर| तभी अचानक से जोर की बिजली कडकती है और मैं डर के कारण आयुष से लिपट जाती हूँ| इस पर आयुष कोई रिस्पोंस नहीं देता है और बिलकुल ही चुप-चाप हो जाता है| अब मेरे उभरे हुए गोल स्तन आयुष के सीने से टकरा रहे थे| मैं उसके शरीर की गर्मी का मजा ले रही थी| उसकी बालों वाली त्वचा मेरे चिकने बदन से टकरा रही थी| मैंने उसे टांगों और अपने हाथों से पूरी तरह जकड़ लिया थ| आयुष अब खुद को ज्यादा रोक नहीं सकता था, उसका औजार अब काफी सुडोल हो चुका था| मैं उसके औजार को ठीक अपनी गुफा से टकराता हुआ महसूस कर सकती थी| तभी आयुष मुझसे कहता है-

राशिका मुझे माफ़ करना मैंने कंट्रोल करने की बहुत कोशिश की

कोई बात नहीं इसमें मेरी ही गलती थी, और तुम्हारी उम्र के हिसाब से ये सब होना स्वाभाविक है – मैंने जवाब देते हुए कहा

और क्या था, मैंने उसके गालों को हलके से चूम लिया| तुम बहुत अच्छी हो राशिका यह कहते हुए बिना किसी देरी किये उसने मेरे होंठों पर उसके होंठों को रखकर चूमना शुरू कर दिया| मैं धीरे-धीरे उसके होंठों का आनंद ही ले रही की थी उसने मेरे होठों के साथ मेरे गले को चूमना शुरू कर दिया| और क्या था में बहुत ज्यादा उत्तेजित होने लग गयी थी| आयुष भी जिस शरीर को इतने समय से निहारता आ रहा था अब वो भी इसकी परिक्रमा करने के लिए बहुत बेताब था|

मैंने भी बिना किसी देरी के अपने हाथों को उसकी शर्ट के अन्दर डाल दिया और उसकी मजबूत कमर को अपने हाथों से सहलाने लगी| वो लगातार मुझे गले से लेकर मेरी जाँघों तक चूमता जा रहा था और मैं उसे जरा भी नहीं रोक पा रही थी, उसने कुछ ही पलों में मुझे अपने वश में कर लिया था| मैंने धीरे से उसके शर्ट को ऊपर की और किया ही था कि उसने तुरंत अपने शर्ट को उतारकर नीचे की और फेंक दिया| मैंने नाईट गाउन पहन रखी थी| आयुष लगातार मेरी नाईट गाउन को उपर की तरफ खींच रहा था और मैं उसे रोकने की हर नाकाम कोशिशें किये जा रही थी| अब तक वो मेरी गाउन को मेरी कमर तक ला चुका था और अब बिना देरी किये उसने मेरी पेंटी को चूमना शुरू कर दिया था| अब-तक में पूरी तरह से टूट चुकी थी| मेरे शरीर को चुमते हुए उसने अचानक से अपना हाथ मेरी पेंटी के अंदर घुसा दिया और मेरी गुफा को ऊपर से नीचे की और सहलाने लगा| अब में और भी ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी| धीरे-धीरे उसने मेरे गाउन को पूरी तरह से निकाल कर नीचे की और फेंक दिया और मेरे स्तन के बीच में अपना मुंह घुसा कर उसे चूमना शुरू कर दिया था| हमने इस पल का काफी इन्तजार किया था और शायद इसलीये हम एक दुसरे को रोक ही नहीं पा रहे थे| अभी आयुष ने मेरी पेंटी को भी पूरी तरह से उतार दिया था और मेरी टांगों को दो अलग-अलग दिशाओं में फैलाकर अपने मुंह को सीधा मेरी टांगों के बीच में डाल दिया था और साथ ही उसे चूमना भी शुरू कर दिया था| उसने मेरी नंगी गुफा को चाटना शुरू कर दिया था, मैंने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन मेरी हर कोशिश अब नाकाम होती नजर आ रही थी| उसका औजार मेरी गुफा की और बढ़ने के लिए बहुत तरस रहा था|

आयुष ने कहा – बेबी मेरे पास कंडोम नहीं और इसलिये हम इसे और ज्यादा आगे नहीं बढ़ा पायेंगे| और कंडोम से संभोग का मजा नहीं आएगा हम बिना कंडोम के इसका मजा लेना होगा|

मैंने अगले दिन से ही गर्भनिरोधक लेना शुरू कर दिया और एक रात हमने फिर से इसे जारी रखने का फैसला लिया| एक दिन रात के समय उसने मेरे स्तन को आम की तरह दबाकर चुसना शुरू कर दिया और बिना देरी किये मेरी पेंटी को निचे की तरफ खींचकर मेरी गुफा में उसके औजार को डाल दिया|

मुझे बचपन से ही स्पोर्ट्स के क्षेत्र में काफी रूचि रही है| इसलिये स्पोर्ट्स करते हुए मेरी सील काफी पहले ही टूट चुकी थी| साथ ही मैंने बचपन से ही पोर्न फिल्मे देखकर मास्टरबेशन करना स्टार्ट कर दिया था इसलिये ये सब करना मेरे लिए कुछ ज्यादा नया नहीं था| लेकिन जब पहली बार किसी का ओजार मेरी गुफा में गया तो मुझे थोड़ा दर्द हुआ लेकिन धीरे-धीरे में इसका और भी ज्यादा आनन्द उठाने लगी थी| आयुष का ये पहली बार ही था इसलिये उसने 15 मिनट में ही अपने घुटने टेक दिए थे|

अगली रात हमने इसे फिर से इसे जारी रखा| आयुष भी काफी ज्यादा पोर्न फिल्मे देख चुका था| और इसी वजह से इस बार वो भी मुझ पर अलग-अलग पोजीशन ट्राई करने लगा था| अब वह काफी समय तक दम भरने लगा था| मुझे भी काफी समय से किसी के साथ सेक्स करने की इच्छा थी, लेकिन मुझे कोई सही पार्टनर नहीं मिल रहा था| लेकिन आयुष के आने के बाद मेरी जिन्दगी पुरी तरह से बदल चुकी थी| कॉलेज के 3 साल तक हमने काफी मजे किये| मुझे अंतिम परीक्षा में काफी अच्छे नम्बर मिले, जिसका पूरा श्रेय आयुष को जाता है| दरअसल हम दौनो ही कॉलेज में काफी अच्छे नम्बरों से पास हुए साथ ही आयुष को अपने बलबूते पर एक बड़ी कम्पनी में जॉब भी मिल गयी थी|